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लोक पहल द्वारा “उत्तर प्रदेश को स्वाबलंबी बनाने एवं प्रदेश के विभिन्न स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलवाने में योगी जी की योजना एक जिला एक उत्पाद का योगदान” विषय पर 12 दिसंबर 2021 को ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध समाजसेवी तथा भारतीय IPR संरक्षणकर्मी पद्मश्री डॉ० रजनीकांत जी रहे।

वक्तागण एवं विचारमाला

पद्मश्री डॉ० रजनीकांत (अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध समाजसेवी तथा भारतीय IPR संरक्षणकर्मी)- विश्वव्यापार संघटन से मुक्त  बाजार का समझौता होना कई देशों के स्थानीय बाज़ारों  को रास नहीं आया। समझौते की आड़ में चीन ने विश्वभर में अपना सस्ता माल फेंक कर वहां के स्थानीय बाजार को धराशाई कर दिया। इस  परिप्रेक्ष्य में मोदी जी ने नारा दिया: लोकल – से – ग्लोबल। अर्थात स्थानीय उद्यम को संरक्षित करते हुए  ही वैश्विव बाजार में पदार्पण किया जाये। अन्यथा वैश्विक बाज़ार घाटे का सौदा साबित होगा। यही अवधारणा एक जिला एक उत्पाद अर्थात वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी ) के रूप में सफलता के नए आयाम स्थापित कर रही है। 

 आज  ओडीओपी केवल उत्तर प्रदेश  नहीं, देश की पहचान बन रही है। देश के 12 अन्य राज्यों में `एक जिला एक उत्पाद ‘ एक मॉडल के रूप में स्वीकारा जा रहा है। अरुणांचल प्रदेश, जहाँ 26 प्रकार  की मुख्य आदिवासी जातियां तथा 72  प्रकार की सह-जातियां हैं, वहां ओडीओपी की स्वीकृति होना इस बिज़नेस  मॉडल की सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। आशा की जा सकती है कि यह बिज़नेस-मॉडल शीघ्र ही देश के सभी भागों में स्थापित होगा। 

आज उत्तर प्रदेश केवल देश का सबसे बड़ा, सबसे अधिक आबादी का ही राज्य नहीं है, देश का सर्वाधिक समृद्धिशाली राज्य भी है। देशभर  में निर्मित हस्तशिल्प उत्पादों  में 46 % का निर्माण उत्तर  प्रदेश में होता है।  देश के सकल  हस्तशिल्प निर्यात में 26 % योगदान अकेले उत्तर प्रदेश का है। इसका एकमात्र कारण  है ओडीओपी की वह विशेषता जो उत्पाद को उसके भोगौलिक क्षेत्र से जोड़ती  है। उत्पाद भले ही विश्व भर में बेचा जाये, मगर उसका निर्माण केवल उसी स्थान पर होगा जो विधिक रूप से  उत्पाद के नाम से  जुड़ा है। अन्य किसी स्थान पर यदि उसका निर्माण होगा, तो अवैध माना  जायेगा तथा ऐसे निर्माता के विरुद्ध दंडात्मक करवाई होगी। इस प्रकार उत्पाद के मौलिक सृजक/निर्माता के हित  संरक्षित रहते हैं और उनके श्रम/ख्याति से कोई अन्य व्यक्ति/संस्था  लाभ नहीं उठा सकता। इस विशिष्ठ पहचान को जीआई (जिओइंडिकेशन) अथवा जिओटैगिंग कहा जाता है, जो एक सरल न्यायिक प्रक्रिया से हासिल की जा सकती है।

जीआई कानून लाने  की प्रक्रिया भारतीय संसद में वर्ष 2003  में शुरू की गयी और 2009 में यह कानून प्रभावी रूप से लागू कर दिया गया। दार्जीलिंग की चाय इस कानून का संरक्षण पाने वाला पहला उत्पाद बनी। उत्तर प्रदेश में अब तक 34 उत्पादों को जीआई मिल चुकी है। देश में सर्वाधिक जीआई लेने वाला राज्य केरल है।  दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र तथा तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है। 

जीआई एक कानून की धारा है जो सुनिश्चित करती है की अलीगढ का ताला बिके चाहे दुनियाभर में, बनेगा केवल अलीगढ में ही। हाथरस की हींग हाथरस में ही बनेगी, अन्य किसी स्थान  पर नहीं। जिओइंडिकेशन एक  150 – 200 पेज का दस्तावेज है जिस पर पीएचडी के अनेकानेक अध्ययन किये जा सकते हैं। ओडीओपी उत्पाद से जुड़े कामगार मात्र 10 रुपये की  सदस्यता शुल्क से अपना पंजीकृत समूह बना कर अपने व्यावसायिक हितों का संरक्षण कर सकते हैं। एक बार जीआई लेकर दस वर्ष बाद उसका नवीनीकरण कराया जा सकता है। जीआई लोगो पर लिखे शब्द जीआई का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार देते हैं : अतुल्य भारत की अमूल्य  निधि।  

ओडीओपी से पूर्व की स्तिथि किस प्रकार की थी ? होता यह था कि हस्तशिल्प/हतकरघा/लघुउद्योग सम्बन्धी कोई भी नीति बना कर उसे सम्पूर्ण राज्य पर थोप दिया जाता था। इस क्रम में राजकीय कोष की बंदरबांट होती होती थी। सोचिये, बनारसी साडी को क्या अयोध्या या बलरामपुर में बनाया जा सकता है ? यदि ऐसा किया गया तो क्या बनारस का साडी उद्योग गर्त में नहीं जायेगा? आवश्य जायेगा। और क्या अन्य स्थानों से आयी साडी बनारसी जितनी ही उत्कृष्ट और लोकप्रिय हो पायेगी ? हरगिज नहीं। इस प्रकार बाजार की आंधी दौड़ में ख्यातनाम उत्पाद और उससे जुड़े  उद्योग / कामगारों का लोप हो सकता है जो देश की  सामाजिक संरचना छिन्न भिन्न हो सकती है।  इस खतरे के दृष्टिगत हर जनपद की पहचान बन चुके उत्पादों को सूचीबद्ध किया गया तथा जिस प्रकार बौद्धिक सम्पदा के अधिकारों को कानूनन संरक्षित किया जाता है, उसी प्रकार से जियोटैगिंग के माध्यम से इन उत्पादों से जुड़े उद्योग को संरक्षित  किया गया। 

ऑडीओपी उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए अनुषंगी उद्योग/कामगारों को अद्यतन तकनीक और प्रशिक्षण से जोड़ा गया। अधिकतर कामगार मुस्लिम समुदाय के होने के कारण इस समुदाय की  सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही हिंदुत्व के झंडाबरदार हों, मुस्लिम समुदाय को `विदेशी’ न मान कर सदैव भारतीय एवं सनातनी मानते रहे हैं। और जब बात राज्य की उन्नति से जुडी हो, उन्होने कभी भी जाति  धर्म या  सम्प्रदाय का  नहीं बल्कि उन  बातों का संज्ञान लिया जो देश-समाज के हित से जुडी हों। 

मुजफ्फरनगर का कोल्हू की पारम्परिक विधि से बनाया गया गुड़ हो, रटौल के आम, रामपुर का सोहन हलवा, या अन्य कोई वस्तु जो अपने भौगोलिक क्षेत्र की प्रखर पहचान हो या बन सकने की क्षमता रखती हो, इन  सभी का भविष्य ओडीओपी  में संरक्षित है, इस बात में कोई संशय नहीं है।

कार्यक्रम का पूरा वीडियो यूट्यूब पर अपलोड कर दिया गया है, देखने के लिए निचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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( उ.  प्र.)  चुनावी  सर्वेक्षण  2022
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